Worship and Prasad in temples, इसमें मंदिरों में देवता की सेवा पूजा और भोग प्रसाद के बारे में जानकारी दी गई है।
मंदिरों में देवता की पूजा के कई विधान होते हैं जिनके द्वारा देवताओं का आह्वान करके उनका स्वागत सत्कार किया जाता है। इन विधानों में से एक विधान भोग प्रसाद का भी होता है।
अलग-अलग काल में भोग प्रसाद भी अलग-अलग हुआ करते थे। जब खेती नहीं हुआ करती थी और शिवजी मुख्य आराध्य देवता थे तब धतूरा, भाँग, मंदार, फूल और दूध आदि पदार्थों का भोग लगता था।
जब मनुष्य शिकार करता था और काली माता मुख्य आराध्य देवी थी तब इनकी सेवा पूजा में बलि, मदिरा और तंत्र आदि का बोलबाला रहा। इस समय राजाओं के दुर्गों की रक्षक देवी दुर्गा ही बनी रही।
जब खेती और पशुपालन शुरू हुआ तब भगवान विष्णु मुख्य आराध्य देवता बने। इस समय खेती और पशुपालन को प्रधानता मिली जिससे अन्न और दूध की चीजें भोग के काम में आने लगी। इस समय भगवान विष्णु मुख्यतया भगवान कृष्ण के रूप में पूजे जाने लगे।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer)
इस लेख में शैक्षिक उद्देश्य के लिए दी गई जानकारी विभिन्न ऑनलाइन एवं ऑफलाइन स्रोतों से ली गई है जिनकी सटीकता एवं विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। आलेख की जानकारी को पाठक महज सूचना के तहत ही लें क्योंकि इसे आपको केवल जागरूक करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।
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